Rasrang


For some time I used to write a column for the Rasrang magazine section of Dainik Bhaskar. This is one of the pieces I wrote for Rasrang several years ago.

 

भारत में संगीत अथवा नृत्य का कार्यक्रम हो और श्रोताओं या दर्शकों को आरम्भ में ही कह दिया जाए कि प्रशंसा स्वरूप तालियाँ बजाने का कष्ट न कीजिये, तो शायद ही सभागार में ऐसा कोई हो जिसे यह बात अटपटी न लगे । लेकिन मुम्बई में नृत्य का एक विशेष कार्यक्रम देखने के लिये एकत्रित दर्शकों को यही सलाह मिली जाने माने नर्तक और नृत्य निर्देशक आस्ताद देबू से । कारण ? आस्ताद अपनी नई प्रस्तुति “कौंट्रापुज़िशन” में आठ बधिर नृत्यांगनाओं के साथ मंच पर एक विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे । वे दर्शकों को बता देना चाहते थे कि कार्यक्रम के समापन पर उनके सहकलाकार तालियों की गड़गड़ाहट को सुन न सकेंगे । ईश्वर ने उन्हें श्रवण सुख से वंचित रखा था । इस लिये दर्शकों को सराहना व्यक्त करने के लिये दोनों हाथ हवा में ऊपर उठा कर हिलाने को कहा गया । और जनाब, हर अध्याय के बाद हवा मे उठते और उत्साह से हिलते हाथों ने कलाकारों की जम के सराहना की ।

और करते भी क्यो न? कला और प्रस्तुतिकरण की कसौटी पर चेन्नई स्थित “क्लार्क स्कूल फ़ार् दि डेफ़” में प्रशिक्षित नृत्यांगनाएं हर तरह से खरी उतरीं । उनके बहरेपन का सबूत केवल उनके झुमकों के पीछे छिपे hearing aid से ही मिलता था, उनके नृत्य या व्यक्तित्व से नहीं । कार्यक्रम के दौरान  एक क्षण को भी बधिर कलाकार बेचारे नहीं लगे ।  वे भरतनाट्यम शैली में प्रशिक्षित कुशल कलाकार हैं, ऐसा ही लगा । और इसका श्रेय जाता है सर्वप्रथम क्लार्क स्कूल की अध्यापिकाओं लक्ष्मी महेश और नारायणी सुब्रह्मण्यम को, और फिर आस्ताद देबू को जिन्होंने विद्या और गुण बाटँने की अनोखी मिसाल कायम की ।

आस्ताद स्वयं आधुनिक प्रयोगशील नृत्य शैली के अग्रगण्य कलाकार माने जाते हैं और देश विदेश में उनका नाम और काम प्रतिष्ठित है ।  सोलह वर्षों से बधिरों को नृत्य सिखा उन्हें अपने साथ मंच पर लाने के सफल प्रयोग को आस्ताद समाज सेवा का ही एक रूप मानते हैं । बरसों से इस काम में जुटे आस्ताद कभी प्रकाश योजना द्वारा दिये इशारे से, और कभी ज़ोर से फर्श पर पैर पटक कर दिये गये संकेत द्वारा अपनी शिष्याओं के ख़ामोश जीवन में लय-ताल का संतुलन बनाये रखते हैं । इससे पहले कथक के आचार्य मुन्ना शुक्ल जी ने भी अपनी एक बधिर शिष्या को ऐसा तैय्यार किया था कि देखने वालों को भनक ही न पड़ती कि तरल गति से नृत्य करती बालिका बिलकुल नहीं सुन सकती । बहरहाल, गुरू मुन्ना शुक्ल हों, या फिर आस्ताद देबू, दोनों ने अपनी शिष्याओं को तो बहुत कुछ सिखाया, साथ ही हम सब को भी पाठ पढ़ाया उदारता का ।

Shubha Mudgal

Shubha Mudgal

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